हमने जिनके लिए दुआ मांगी,वो गैरों की दुआओं के तलबगार निकले,
जिनकी ख़ातिर इक वक्त में खुदा थे हम,अब हम उनकी ही नज़रों में गुनहगार निकले
जिन्होंने कभी लाख अच्छाइयां गिनाई थीं मुझमे,अब हम उनकी खातिर महज़ बेकार निकले…!!
यूँ वादे करके जो मुकर जाते हो ..
क्या तुम भी सियासत वालों के घर जाते हो … ?
सब ईमान की मौत मांगते हैं,ईमान की ज़िंदगी क्यों नहीं ?
नीरज से बढ़ के और धनी कौन है यहाँउस के हृदय में पीर है सारे जहान की
दुनिया समझ में आई मगर आई देर से,,कच्चा बहुत था रंग उतरता चला गया..!!