वह पथ क्यापथिक कुशलता क्याजिस पथ पर बिखरे शूल न होंनाविक की धैर्य परीक्षा क्याजब धाराएँ प्रतिकूल न हों जयशंकर प्रसाद

इश़्क़ कि तड़प में विरह का बंदी गया,आज मैं खुद से खुद का प्रतिद्वंद्वी बन गया..!!

जेहन में उसके नाज़ी का नायक इतराता हैपर होंटों से वो गांधी-गौतम को गाता है!

अगर होता दिलों के पास कोई कान,तो आँखों की ख़ामोशी भी सुनी जाती.!

बारिश के मौसम में सन्नाटे में, एकांत का असली सुख पता चलता है, हम जिस रस में होते हैं उसी में डूब जाते हैं, इसमें भी हल्की ध्वनि में संगीत सुनते हुए मदिरापान का आनंद शेष सभी प्रकार के सुखों...

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