ज़र्द चेहरों की किताबें भी हैं कितनी मक़्बूल… तर्जुमे उन के जहाँ भर की ज़बानों में मिले…

कुछ नहीं था बेचने को ,अपने दिल के ख्वाब बेचे हैं...

मुमकिन नहीं मेरा पहले जैसा हो पाना खुद को बहुत पीछे छोड़ आई हूँ मैं

कोई मुझ से पूछ बैठा ‘बदलना’ किस को कहते हैं ?सोच में पड़ गया हूँ मिसाल किस की दूँ? “मौसम” की या “अपनों” की…🌻

“संगीत” लगाता है मन की पीड़ाओं परमरहम सुकून का

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