इन्सान की ख्वाहिशों की कोई इंतिहा नहींदो ग़ज़ ज़मीं भी चाहिए दो ग़ज़ क़फ़न के बाद

भारत कृषि प्रधान देश था अब कुर्सी प्रधान देश है !!!

हर रिश्ता इसी कागज़ का गुलाम हैं..जिसे हम पैसा कहते हैं...

बहुत महंगा पड़ता है वो रिश्ता,जिसमे खुद को सस्ता कर दिया जाए…

ख़ुशियों के झोंके सा है वो जिसे भी छूकर गुजर जाता हैज़हन में उसके मुस्कुराहटें भर जाता है

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