हर रिश्ता इसी कागज़ का गुलाम हैं..जिसे हम पैसा कहते हैं...

बहुत महंगा पड़ता है वो रिश्ता,जिसमे खुद को सस्ता कर दिया जाए…

ख़ुशियों के झोंके सा है वो जिसे भी छूकर गुजर जाता हैज़हन में उसके मुस्कुराहटें भर जाता है

दुनिया का सारा मोटिवेशन एक तरफऔर मां पापा का यह कहना कि घर के हालात तुम्हें बदलने है ,एक तरफ!

हर स्त्री कुछ हद तक शिव के जैसी होती है, क़तरा-क़तरा विष जीवनभर पिया करती है…

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