पर्दा जिंदगी का हो या सिनेमा हॉलों काअंधेरों में दिखती है हकीकत उजालों की..!!

तुम्हारी यादों की मंडी ऐसे लगती है मेरे ख्वाबो में,मानों कब से हमने कुछ ख़रीदा ना हो।"

मैं भाल-भाल पर कुंकुम बन लग जाऊंगा lमैं तलवारों से मेघ-मल्हार गवाऊंगा ll

जब उसकी रूह घायल हुई तो किसी ने नही समझा ,जब वो बुत बन गई तो सब आ गए सुझावों की किताब ले कर।।

जिन्दगी संघर्षो का दरिया है इसे किस तरह,पार करना है ये सब अपना-अपना नज़रिया हैं…

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