भूले-बिसरे हुए ग़म फिर उभर आते हैं कईआईना देखें तो चेहरे नज़र आते हैं कई ~ फ़ुज़ैल जाफ़री

रिश्ते नातों के बिना ये जिंदगी वैसी हैजैसे लकवे से ग्रसित शरीर सुन्न पड़ी है॥

लहू रिसने नही देता कभी जो अपने अंदर से ,ज़माना सोचता है वो ज़ख़्म ताज़ा नहीं होता!बस आंखों की उदासी खोलती है राज ए दिल वरना ,मेरे चेहरे से मेरे गम का अंदाज़ा नहीं होता!

कभी कभी लगता है जिनको मोहब्बत में ज्यादा तमन्ना नहीं होती है न.. उनके ही ज्यादा गहरे ज़ख्म होते हैं

मैं हूं कि जनवरी से आस लगाए बैठा हूं तुम हों की जून में भी नहीं पिघल रही हों

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