बचपन के घाव अच्छे थे,बस घुटनों पर ही लगते थे..

शीशे टूटने के बाद कहाँ जुड़ पाते हैं जो जुड़ भी जाए तो एक ही अक्स हज़ार नजर आते हैं।

टूटे तो बिखर जगाओगे...अंत में तबाह ही हुऐ हैं बिखरने वाले !

वक्त अच्छा हो तो लोग हाथ पकड़ते हैं ,और वक्त खराब हो तो गलतियाँ पकड़ते हैं ...

वो ख़्वाब रात काचाय साँझ कीबारिश की बूंदें रूमानीवही समां पुरानाधड़कनों से बतियानाबदला नहीं है कुछ भीवही मिज़ाज़ आशिकानाचलो निभाते हैं हम तुमवही पुराना याराना लेकर चुस्कियाँ चाय कीकरेंगे गुफ्तगू शायराना

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