परिवार और समाज दोनों ही बर्बाद होने लगते हैंजब समझदार मौन और नासमझ बोलने लगते हैं।

आप बस किरदार हैं अपनी हदें पहचानिएवरना फिर एक दिन कहानी से निकाले जाएंगे

हम खड़े वहां होते हैं जहां बैठने को जगह नही होती...

होठों पर जरूरत से ज्यादा बिखरी हंसी,अक्सर गवाह होती है आंखों में पसरी हुई उदासी की....

रखना अपने शौक को ज़िन्दा,किसी के मोहताज मत होना,शरीर भले ही लाचार रहे,मगर दिमाग से अपाहिज़ मत होना..

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