हर बार न जाने क्यों अगर मगर में उलझ जाते हैं जो कहना होता है उनसे वो कह नही पाते हैं

" ऐब " भी बहुत है मुझमे , और " खूबियां " भी , ढूँढने वाले तू सोंच , तुझे क्या चाहिये मुझमे ..!!

तुम लाख कोशिश कर लो इस्लाम का नामोनिशान मिटाने की, लेकिन हकीकत यही है जुगनूओं के समूह से कभी जंगल नहीं जला करते।

तूफान ज्यादा हो तो कश्तियां डूब जाती हैं और घमंड ज्यादा हो तो हस्तियां डूब जाती हैं..

जीने कि "ललक" तब और ज्यादा होती है, जब दादा कि बैसाखी उनकी "पोती" होती है..!! विरक्ति

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