कभी इसका दिल रखा और कभी उसका दिल रखा इसी कशमकश में भूल गए खुद का दिल कहाँ रखा

मंज़िल को अगर पाने की होड़ है तो फिर क्या फर्क पड़ता कि राहों मे कितनी मोड़ है

ये इश्क़ नहीं आसां इतना ही समझ लीजे इक आग का दरिया है और डूब के जाना है जिगर मुरादाबादी

इस बार ऐसे छोड़ की हासिल ना हो सकू आऊ ना अपने हाथ भी ऐसे गवा मुझे

तुझे देखते ही मेरा खिलना एक तरफ, घर पे झूट बोल के तूझसे मिलना एक तरफ...

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