ये इश्क़ नहीं आसां इतना ही समझ लीजे इक आग का दरिया है और डूब के जाना है जिगर मुरादाबादी

इस बार ऐसे छोड़ की हासिल ना हो सकू आऊ ना अपने हाथ भी ऐसे गवा मुझे

तुझे देखते ही मेरा खिलना एक तरफ, घर पे झूट बोल के तूझसे मिलना एक तरफ...

फंस गयी है मेरे जीवन की गुत्थी, अब तू सुलझा दे मुझे, अगर मुमकिन हो तो अपनी जुल्फ़ों कि लटों में उलझा ले मुझे..!!

हम भी सीने में धड़कता हुआ दिल रखते हैं ,हमको तफ़रीह का सामान न समझा जाए ,

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