जिंदगी की रफ्तार में, जमीर को रौंदकर लोग आगे बढ़ रहे है।

जमाने मे और भी दर्द है , सहने को साहब, हर उतरे हुए चेहरे का मसला , इश्क नही होता..!!

रोयी भी हूँ रूठी भी हूँ , अकेले में टूटी भी हूं.

मैं जिसे ओढ़ता-बिछाता हूँ, वो ग़ज़ल आपको सुनाता हूँ। एक जंगल है तेरी आँखों में, मैं जहाँ राह भूल जाता हूँ। दुष्यंत कुमार

सरफिरे लोग हमें दुश्मन-ए-जां कहते हैं, हम जो अपने मुल्क की मिट्टी को भी #माँ कहते हैं...

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