कितना बचा के रखते हैं हम समाज में अपनी छवि को, जबकि बचाना हमें हमारे विचारों और कर्मों को चाहिए अर्चना अनिरुद्ध

तकलीफ देता है, इस कदर सच्चा होना अब अच्छा नहीं लगता! यूं अच्छा होना

विश्वास का टूटना, श्वास के टूटने से कहीं अधिक कष्टकारी होता है.

तबाही में भी वो करता है अपनी वाह-वाही... क्या खूब है इस तानाशाह की ये तानाशाही...

बोध हो तो सभी बातें रहस्यपूर्ण हैं । वृक्ष से एक सूखे पत्ते का गिरना भी ।

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