कोई गिरता गया कोई गिर ही गया

फिर से उलझाता है सबको नफ़रत वाली बात में दूसरे राउंड में ही लुच्चा आ गया औक़ात में

प्रीत न जाने जात कुजातनींद न जाने टूटी खाट,भूक न जाने बासी भातप्यास न जाने धोबी घाट

इतवार की सुबहइत्मीनान वालासुकून चाहती हूंकोई हो जग जाएमुझसे पहले मेरे लिएताकि सो सकूँ औरमेरी चिंता कर पाए।कहे सबसे धीरे सेसोने दो उसे ज़राथकी हुई सी आजउसे आराम जी भरतसल्ली से करने दोसोती रहूँ बेफिक्र सेकरे मेरी फ़िक़्र ज़राकहे सब...

देश चलता नहीं,मचलता है,मुद्दा हल नहीं होता सिर्फ उछलता है,जंग मैदान पर नहीं,मीडिया पर जारी है,आज तेरी तो कल मेरी बारी है।

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