आदत अकेलेपन की जो पहले अज़ाब थी , अब लुत्फ बन गई है अज़ीयत नहीं रही ।।

एक उदास शहर में कुछ किताबें थी एक छत चार दीवारें थीं कुछ दोस्त थे चाय के कुल्हड़ थे गलियाँ थी किनारे थे एक उदास शहर में जहाँ वो थी और ज़िंदगी थी..

राम दवा हैं रोग नहीं हैं सुन लेना राम त्याग हैं भोग नहीं हैं सुन लेना हरिओम पंवार

जिंदगी एक दिन खत्म हो जाएगी, बस इसी बात की खुशी है मुझे....

मन करे कभी कुछ अच्छा करने का, तो हांथ किसी विधवा का थाम लेना, किसी बेसहारा अभागी स्त्री कि, मांग फिर से तुम संवार देना, और ये कैसा समाज है जो बेटे को, दूसरे विवाह के लिए हां कहता है, वहीं दिखाकर डर घर कि इज्ज़त,...

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