देखता हूं तुझे बड़ी गौर से ऐ इंसान
सुना है तू दिन भर में कई रंग बदलता है
अधूरापन कभी खत्म ही नहीं होता,
कभी आंखें नहीं होती तो कभी काजल..!!
पवित्र महीना सावन का है,
भोले तू मुझको भी पवित्र कर दे,
महका सकूं अपने कर्मों से,
सबको तू मुझको ऐसा इत्र कर दे..!!
चले जाना चाहता हूँ
बहुत दूर...
जहाँ कोई भी न हो!
चले जाना चाहता हूँ
उन बर्फीली पहाड़ियों के अनज़ान सफ़र पर
जिसका कोई अंत न हो!
मैं ख़ुद को भी भूल जाना चाहता हूँ!
परिन्दों की तरह सब कुछ छोड़
आसमां में उड़ना चाहता हूँ!
आंखें थक गई थी "इंतज़ार" में फिर भी दस्तक लगाए बैठा रहा,
हलक सूख गया रोते रोते मगर वो अपनी अकड़ में ऐंठा रहा..!!
विरक्ति