किताब के पन्ने की तरह मोडे गए फिर ना कभी खोले गए ना पढ़े गए

हमारा चरित्र कितना ही दृढ़ हो, पर उस पर संगति का असर अवश्य होता है।" प्रेमचन्द

ज़िन्दगी के तजुर्बों में एक अनुभव ये भी सबसे काम का रहा,गोपनीयता को प्राथमिकता देने वाला हर इंसान नमक हराम रहा

मजबूरिया तुम पर आई और तन्हा हम हो गए

जिन साँपों को गुरूर है आपने जहर पर मैं उन्हें बता दू कि मैं इलाज जानता हूं।

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