कुछ आस थी कभी, कभी कुछ वहम था एक दरिया सा और एक विशाल सागर सा वो आस भी ले डूबी और वहम भी ले डूबा कभी गहरी आग सा तो कभी गहरे पानी सा ...

ख्वाहिशों के पिटारे पर ज़िम्मेदारी की आरी चल जाती है, जबतक समझता है वो कर्मों को तबतक उम्र ढल जाती है..!!

शब्दों का भी तापमान होता है साहब , ये सुकून देते हैं तो जला भी सकते हैं।।

मयस्सर तुम्हारा साथ होता तो श्रंगार के चारचांद लगा देता, और ना बांध पाती अगर तुम साड़ी, तो पल्लू मैं बना देता..!!

मन ऊदास है ना जाने कैसी ये प्यास है,,,, निगाहे ढूंढती है जिनको ना जाने वो किसके पास है,,,,

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