ऊँचे मकान खा गए सब मेरे घर की धूप
हिस्से में मेरे रह गई बालिश्त भर की धूप।
जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाँहिं।
सब अँधियारा मिटि गया, जब दीपक देख्या माँहि॥
सेलो टेप हो या संबंध...
कभी ऐसे ना छोड़ा करो,
कि वापिस ढ़ूंढ़ने के लिए खरोंचना पड़े..
गालों पर उंगलियों की छाप
पीठ पर लात जूतों की बरसात
होंठों पर दाँतों के निशान
मुख की कोरों से बहता रक्त
कानों में गूँजती
रिश्तों को शर्मशार करती
हुईं गालियाँ
'उन दिनों'.
उसकी टाँगों के नीचे
आने से मैंने मना क्या कर दिया
बस..
उसने एक चुटकी...
गुज़रो जो बाग़ से तो दुआ माँगते चलो
जिसमें खिले हैं फूल वो डाली हरी रहे