पता नहीं नसीब खराब है या मैं खराब हूं हर उसने दिल दुखाया हैं जिसपे मुझे नाज था !!

ये ढलती हुई शाम, करती है दीवानों का काम तमाम। बात गहरी है, गहराई से सोचना, कोई राह देखता है, तो कोई सरेराह देखता है।

मत कीजिए मुझ पर यकीन, मैं तो खुद को भी धोके में रखता हूं...!!!

सुलह कराने में लगा हूं दिल और दिमाग के बीच दिल मानता नहीं दिमाग सोंचता नहीं कुसुरवार दोनों हैं दिल स्वीकारता नहीं दिमाग जानता नहीं मुद्दा जो था वो रहा नहीं जाने से पहले दोनों से कुछ कहा नहीं

यूँ ही आबाद रहेगी दुनिया, हम न होंगे, कोई हम सा होगा !

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