हे भगवान ये क्या हो रहा है। चक्र कहां है आप का।

इतना कुछ था दुनिया में लड़ने-झगड़ने को पर ऐसा मन मिला कि ज़रा-से प्यार में डूबा रहा और जीवन बीत गया

अभी तो नापी है मुठ्ठी भर जमीं, अभी तो आगे पूरा आश्मा बाकी है...

अपना खुन पसीना बहा कर जो जमीन को हरी-भरी उपजाऊ बनाता है वो किसान ही तो है जो हमें दो वक्त की रोटी देता है...

सुन लेंगे एक दिन प्रभु तुम्हारी भी, श्रद्धा से एक बार पुकारो तो सही..

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