क़ीमत दोनों की चुकानी पड़ती है, बोलने की भी और चुप रहने की भी

साल भर पहले, पहला ‘मकान’ लिया तुम्हारे साथ ने उसे ‘घर’ किया

हे भगवान ये क्या हो रहा है। चक्र कहां है आप का।

इतना कुछ था दुनिया में लड़ने-झगड़ने को पर ऐसा मन मिला कि ज़रा-से प्यार में डूबा रहा और जीवन बीत गया

अभी तो नापी है मुठ्ठी भर जमीं, अभी तो आगे पूरा आश्मा बाकी है...

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