रोज़ रोज़ ये मुलाक़ात इत्तफाक तो नहीं मेरी तरह हुजूर धड़कने बेईमान तो नहीं

मैं कैसे कह दूँ आज मेरे मन में व्यथा नहीं, पर संघर्षों से घबरा जाना मेरे कुल की प्रथा नहीं..!

सुनो ये हकीक़त बहोत पुरानी है चाय आज भी दिल की राजधानी है...

सकारात्मक विचार कड़वे जरूर होते हैं मगर इनका परिणाम हमेशा सुखद होता है।

क्या तुम.. नही मिलोगी यह पूछतीं हैं मुझसे बेचैन सांसें मैं बस टकटकी लगाकर सुनसान सड़क के उस मोड़ को देखता रहता हूं जहां से तुम ओझल हो गई थी इस आस में.. कभी तो समय की ये बेरहम धुंध छटेगी और तुम.. लौट आओगी...

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