खामोशी गवाह है, इंसान अंदर से थक चुका है...

फस गया हूँ जिंदगी के कुरुक्षेत्र में अभिमन्यु की तरफ , बचाने कोई आने वाला नही और मैदान मैं छोड़ूंगा नही..

मैं मुंतजिर हुं तेरा तू हर दफा चाहिए जैसे किसी बीमार को दवा चाहिए

खामोशी से खत्म हुए रिश्ते, मन में गहरा शोर छोड़ जाते हैं।

दिलों के दरवाज़े नहीं होते, बस सरहदें होती हैं।

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