ना जाने यह ज़िंदगी कैसे-कैसे इम्तिहान लेती है फूलों के गुलदस्ते में छुपाकर खंजर जान लेती है

भिन्न मत का मान रखो, गलत का नहीं

थमती नहीं है जिंदगी यहां किसी के बिना, पर गुजरती भी नहीं है अपनों के बिना।।

मैं रास्ते भूलता हूँ और इसीलिए नए रास्ते मिलते हैं

शहर की धूप से परेशान जब मैं छांव ढूंढती हूं,, सुकून के लिए तब मैं अपना गांव ढूंढती हूं,,

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