छुट्टी तो आती है, पर कोई आराम नहीं आता, क्यों औरत के हिस्से में उसका इतवार नहीं आता.

भरोसें के काबिल नहीं है ये जिंदगी..!! शिकायत हो या मोहब्बत,अभी कर लो..!!

चाहे शरीर साथ ना दे या बीमार रहे, फिर भी मजदूरी करता है, एक पिता घर कि ज़िम्मेदारी, अपनी सांस बेचकर पूरी करता है.

एक तुम्हारे ना होने से ऐसे लगता है जैसे, सुबह से शाम होने मे कई दिन लगते है ..

भागते हुए छोड़कर अपना घर पुआल, मिट्टी और खपरे पूछते हैं अक्सर ओ शहर! क्या तुम कभी उजड़ते हो किसी विकास के नाम पर?

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