चाहे शरीर साथ ना दे या बीमार रहे, फिर भी मजदूरी करता है, एक पिता घर कि ज़िम्मेदारी, अपनी सांस बेचकर पूरी करता है.

एक तुम्हारे ना होने से ऐसे लगता है जैसे, सुबह से शाम होने मे कई दिन लगते है ..

भागते हुए छोड़कर अपना घर पुआल, मिट्टी और खपरे पूछते हैं अक्सर ओ शहर! क्या तुम कभी उजड़ते हो किसी विकास के नाम पर?

बस पेड़ गांव के हिस्से में होते है और फल शहर को मिल जाते हैं ।

इतने कमजोर नहीं की, वफादार होने का ऐलान करें, हमें यकीन है अपने किरदार पर, जो "खोएगा", "ढूँढता" फिरेगा...

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