बेवफ़ाओं के तो बन जाते हैं हज़ारों महबूब, निभाने वालों का कब कौन यहाँ होता है

तुम्हारा एकांत ही तुम्हें मनुष्य बना सकता है, भीड़ तुम्हें भेड़ बना देगी

अहमियत देने पर लोग इतराते बहुत है...

औरत को समझता था जो मर्दों का खिलौना उस शख़्स को दामाद भी वैसा ही मिला है

सहनशीलता, क्षमा, दया को तभी पूजता जग है बल का दर्प चमकता उसके पीछे जब जगमग है।

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