उन रिश्तों का खत्म हो जाना ही बेहतर है, जहां दुख और अपमान के सिवा कुछ न मिले...
सर कुचलने का भी हुनर रखती हूँ;
नगिन के डर से जंगल नही छोड़ा करती मैं !!
हम भूल सके हैं, न तुझे भूल सकेंगे,तू याद रहेगा हमें, हाँ याद रहेगा.
सच को कहाँ होती है तमीज़ बात करने की ,झूठों से सीखो कितना मीठा बोलते हैं …
पहले लगता था कि.... तुम ही दुनिया हो... अब लगता है कि.... तुम भी दुनिया हो....!!!
फिर आखरी बार भी नहीं मिला मुझसे, जो मिलने वाला था "उम्र भर के लिए"
“छत टपकती हैं उसके कच्चे मकान की….फिर भी बारिश हो जाये तमन्ना हैं किसान की”
नशे में आने दे ऐ वक्त ,होश में रहकर तेरे सब जवाब नहीं दे सकता ..!!
जैसे जैसे उम्र गुजरती है हमें अहसास होता है कि
माता पिता हर चीज़ के बारे में सही कहते थे!
ज़िद्दी हूँ बहुत ज़्यादा गुस्सैल भी हूँबत्तमीज़ भी हूँ बेपरवाह भी हूँलेकिन मैंने कभी किसी से भीमतलब के लिए रिश्ते नहीं रखे...
जब-जब धर्म की ग्लानि-हानि यानी उसका क्षय होता है और अधर्म मे वृद्धि होती है, तब-तब मैं धर्म के अभ्युत्थान के लिए अवतार लेता हूं !!
इतरा रहे हो ज़िस्म पर नए हो इश्क़ में
रूह के तलबगार से पाला नहीं पड़ा
भागते हुए छोड़कर अपना घर
पुआल, मिट्टी और खपरे
पूछते हैं अक्सर
ओ शहर!
क्या तुम कभी उजड़ते हो
किसी विकास के नाम पर?
सावन का महीना है तू घर से निकली भी नहीं
माना कि खूबसूरत है तू, मगर इतनी भी नहीं।
~सौरभ
ज्यादा अच्छे मत बनो
अच्छे से इस्तेमाल कर लिए जाओगे !
पैसा इन्सान को ऊपर जरूर ले जाता हैं,
परंतु इंसान पैसे को ऊपर नहीं ले जा सकता....
याद करोगे तो याद रहोगे वरनायाददास हमारी भी कमजोर है जनाब !
मैं कितनी भी कोशिश कर लूअपनी शायरी में प्यार के रंग नहीं उड़ेल पाती
मेरेशब्दोंमें अक्सर जिक्र होता है
रुसवाई, बेवफाई,बेरुखी,बेचैनी,आँसूक्योंकि आज तकमुझे तुमसे यही सब मिला हैइश्क क्या होता है?कभी जान ही नहीं पाईजो तुमसे आजतक नही मिलाशायद वही इश्क था
दुःख में उपस्थित रहने वाले व्यक्ति, सर्वदा सम्मान के पात्र होते है।
-तरुण श्रीवास्तव
किसी मंदिर के बाहर लिखा था बेझिझक भीतर चले आइये…." पाप " करके आप थक गए होंगे ?मगर….." माफ़ " करके मैं नहीं थका.।।