इंसान अगर सच्चा हो तोलोग उसे बेवकूफ समझ लेते हैं !!
हकीकत से सामना हुआ तो,
पता चला लोग सिर्फ बातों से अपने थे....
उसे खोना… मतलब खुद को खोना….इसलिए मैं उसे पाकर… मैं आबाद होना चाहती हूं…
अब मुझे दूसरे का क्या,
ख़ुद का आंसू पोंछना नहीं आता,
हमने देख लिया हैं रूठ कर,
यहां कोई मनाने नहीं आता!
"मुझे भी सिखा दो वादों से मुकर जाना,
बहुत थक गया हूँ निभाते निभाते".......!!
बड़े शातिर हैं लोग निभाने के नाम पर बस,एक निभाने का रिश्ते रखते हैं….!!
यह जिस्म होता हैतो सब कुछ ख़त्म हो जाता हैपर चेतना के धागेकायनाती कणों के होते हैंमैं उन कणों को चुनूँगीधागों को लपेटूँगीऔर तुम्हें मैं फिर मिलूँगी…
~ अमृता प्रीतम
अश्कों से .. धोखों से .. जख्मों से मिलता है ..
सबक जिंदगी का ,
कहाँ दो - चार किताबों से मिलता है...
बड़ा अजीब खेल खेलता है खेलने वाला
दिन भर बारिश में भीगता रहा छाता ठीक करने वाला
सियासत को लहू पीने की लत है ,
वरना हमारे मुल्क में सब खैरियत है ।।
बदले बदले से सब हुज़ूर नज़र आते हैं
चुनाव तक कौन कौन वही रह जाते हैं।
आपको लेकर मेरा खयाल नहीं बदलेगा,
साल बदलेगा मगर दिल का हाल नहीं बदलेगा।
हवस की भूख एक ऐसी भूख है जो पेट भरने,
और दिमाग़ ख़ाली होने के बाद लगती है..!!
अनवर चतुर्वेदी
पानी और चरित्र कितना भी साफ क्यों ना हो,
लोग इन्हें मैला करने में कोई कमी नहीं छोड़ते....!!
किसी को मनाने से पहले ये ज़रूर जान लेना,कि वो तुमसे नाराज़ है या परेशान ।
बहुत ज़्यादा फ़र्क पड़ने के बाद..
फ़िर कुछ ख़ास फ़र्क नहीं पड़ता..!!
सबसे ख़तरनाक होता है
मुर्दा शांति से भर जाना
न होना तड़प का सब सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर
और काम से लौटकर घर जाना
सबसे ख़तरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना
सबसे ख़तरनाक वह घड़ी होती है
आपकी कलाई पर चलती हुई...
ये अलग बात कि ख़ामोश खड़े रहते हैंफिर भी जो लोग बड़े हैं, वो बड़े रहते हैं।
दुःख देखिएहम सब अकेले हैंफिर भी हमारे पास समय नहीं हैकिसी अकेले के लिए।
नरेश गुर्जर
ज़ुबाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो देमैं कितनी बार लूटा हूँ मुझे हिसाब तो दे।