की गैर तो गैर है गैरों से गिला क्या..
अपने तो अपने हैं अपनों से मिला क्या..!!
अपना खुन पसीना बहा कर
जो जमीन को हरी-भरी
उपजाऊ बनाता है
वो किसान ही तो है
जो हमें दो वक्त की रोटी देता है...
मैंने ख़त लिख रखा है आँखों मेंआप नजर मिलाकर पढ़ो तो सही
वो ख़्वाब रात काचाय साँझ कीबारिश की बूंदें रूमानीवही समां पुरानाधड़कनों से बतियानाबदला नहीं है कुछ भीवही मिज़ाज़ आशिकानाचलो निभाते हैं हम तुमवही पुराना याराना लेकर चुस्कियाँ चाय कीकरेंगे गुफ्तगू शायराना
तुम्हे दाल के पकोड़े पसंद है
लो फिर हम कौनसे कम है ☕
बिसाते-जिंदगी पर हसरतों के प्यादे हैं,
मुकम्मल लोग भी कितने अधूरे-आधे हैं...
वक्त का खास होना जरूरी नहीं.... खास लोगों के लिए वक्त होना जरूरी है...!!
तुमसे मेरा प्रेम कुछ ऐसा रहेगा,दुनिया उदाहरण दे हमारा, वैसा रहेगा.
जिंदगी में सबसे ज्यादा जरूरी है "नींद", बाकी सब मोह माया है!!
ये कैसा भार हैं जब
मैं मुझमें ही रिक्त हूं..!!
हमारी खामोशी को हरगिज बुझदिली ना समझा जाये,,,अभी हम तेरे जुल्म और अपने सब्र की इंतहा देख रहे है,,
कौन रखेगा मेरे होठों पे उंगली अपनी..कौन बोलेगा "नहीं, ऐसा नहीं कहते"..
सन्नाटा इस कदर पसरा है जज़्बातों की मौत का,
अब तो तन्हाई भी मुझे सुनाई पड़ती है...!!
बदलती दुनिया में अजीब सा फसाना आया है,
किरदार का दौर गया दौलत का ज़माना आया है।
वक़्त बदल गया है अब बेटियाँ नहीं, बेरोजगार लड़के माँ-बाप के कंधों पर बोझ होते हैं।
जैकी यादव
उसने कहा ‘‘फिर मिलेंगे” मैंने कहा “जल्द लौटना” उसने कहा “क्यों?” मैंने कहा “आज से पहले मैंने किसीका यूँ इन्तिज़ार नहीं किया.
गांव की मिट्टी के पले बढ़े हैं,हमें अदाएं कम और मर्यादाएं ज्यादा पसंद हैं….
ख़ामोशी को चुना है मैंनेक्योंकि बहुत कुछ सुना है मैंने!
मै लेखक हू लेकिन मै उद्दंडता नही लिखता,देश को पृथक करने वाली उग्रता नही लिखता,इंसान हू मै इसलिए हिन्दू मुस्लिम नही लिखता,हिन्दुस्तान के गौरव पर चोट करती अशिष्टता नही लिखता,और इश्क चाहती है मेरी कलम मै दुष्टता नही लिखता,मै द्वेष...
इज्ज़त, आबरू और अपनी मर्यादा समझते बूझते,एक स्त्री के जीवन काल कि तस्वीर धूमिल हो जाती है..!!