हंसने की आदत डाली है,
खुशी का कुछ एहसास नहीं,
आसू भी अक्सर डुलते है
पर दुःख भी कोई खास नहीं,
नकाबों मैं वक्त गुजरे अपना,
गहरे अपने जज़्बात नहीं...!!
लैलाओं को महलों का दुःख होता है,चौराहों पर मजनू पत्थर खाते हैं.
कुछ लोग दूर से बहुत अच्छे लगते है
फोल्लोविंग मैं आने के बाद घटिया लगते है
वादों की जरूरत नहीं होती उन रिश्तों में,
जहां निभाने वाले पर भरोसा होता है...
अक्सर, पिताओं के गुज़र जाने के बाद ही
हम उनसे प्यार करना सुरु करते हैं.
तू न थकेगा कभी, तू न रुकेगा कभी, तू न मुड़ेगा कभी, कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ, अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ। यह महान दृश्य है, चल रहा मनुष्य है, अश्रु श्वेत रक्त से, लथपथ लथपथ लथपथ, अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ।
थक कर बैठा हूं हार कर नहींबाजी हाथ से निकली है जिंदगी नहीं…
ये राते ठहर क्यों नही जाती, नींदों मे ही सही दो पल देख तो लूँ तुम्हे।।
सफलता सार्वजनिक उत्सव है
जबकि असफलता व्यक्तिगत शोक ….. !!!
अजीब है..
औरत खुल कर हंस नहीं सकती बद किरदार कहते हैं,
मर्द खुल कर रो नहीं सकता कायर कहते हैं..
हर शायरी किसी ना किसी के लिये एक गुमनाम खत है..!
जो किसी के घर के पते पर नही मन की,दहलीज पर खुलती है।
दया अगर लिखने बैठूं होते हैं अनुवादित रामरावण को भी नमन किया ऐसे थे मर्यादित राम
~अज़हर इक़बाल
सभी लोग "मरते" हैं...
पर वास्तव में सभी लोग "जीते" नहीं हैं..!!
प्रेमिकाओं ने प्रेम में हमेशा ,
अपना भविष्य चुना है , प्रेमी नहीं।
मसला ये नहीं की लोग परवाह क्यों नहीं करते,
मुद्दा ये है की हम उम्मीद क्यों करते हैं...
मेरे कांच जैसे दिल मे,
कुछ पत्थर जैसे लोग रहते है।
❤️🩹
मैं लाख़ गुनहगार सही ज़माने की नज़र में.... तेरे लिए जज़्बात मगर पाक बहुत हैं..!!
यूँ ही आबाद रहेगी दुनिया,
हम न होंगे, कोई हम सा होगा !
"माँ थी अनपढ़
लेकिन उसके पास गीतों की कमी नहीं थी
कई बार नये गीत भी सुनाती
रही होगी एक अनाम ग्राम-कवि"
आलोक धनवा