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घायल होना कहानी का अंत नहीं, वारदात होगी क्योंकि हम शांत हैं संत नहीं..!!

हर क़दम इस एहसास से आगे बढ़ी हूँ कि मेरे पीछे मैं खुद ही खड़ी हूँ !!

मयस्सर इन आंखों में डूबना होता, मैं ताउम्र कभी तैरना ना सीखता..!! विरक्ति

वो वस्त्र पर वस्त्र बदलते रहे.. और इधर प्रजा निर्वस्त्र होती गई

डिग्रिया तो आपकी पढ़ाई के खर्च की रसीदें है.. ज्ञान वही है जो आपके किरदार में झलकता है.!

मैं हूं कि जनवरी से आस लगाए बैठा हूं तुम हों की जून में भी नहीं पिघल रही हों

आँखों की गहराई में उतार जाओ,दिल की धड़कनों में बस जाओ,ख्वाबों की दुनिया में खो जाओ,तुम्हारी हर ख़्वाहिश पूरी हो जाए।

तेरा चुप रहना मिरे ज़ेहन में क्या बैठ गयाइतनी आवाज़ें तुझे दीं कि गला बैठ गयायूँ नहीं है कि फ़क़त मैं ही उसे चाहता हूँजो भी उस पेड़ की छाँव में गया बैठ गयाइतना मीठा था वो ग़ुस्से भरा लहजा...

क्या थी मेरी गलती जो मुझे अकेला छोड़ गयी तू बिना सोचे मुझे क्यों इतना तनहा छोड़ गयी तू .!!

जल्दबाजी में किया गया विश्वास और मेहनत के, बिना लगाई गई आस दोनों का परिणाम धोखा होता हैं..!!

"तुम!! जानते हो मेरे इस जीवन में सबसे अधिक किसकी जरूरत है-?"पहली लाईन के पहले ही शब्द की.

फ़िज़ा भी है जवां जवां हवा, भी है रावण रावण

रिश्तों को निभाने में भावनाएं होनी चाहिए, विवशता नहीं..

थक जाता है इंसान "ख्वाहिशें" पूरी होने से पहले,कभी परिस्थितियां मार जाती हैं तो कभी ज़िम्मेदारियां..!!

इक्का चाहे कितना भी उछलें.. हुकुमत तो बादशाह ही करता है..!!

मैं बेरागी हूं… महादेव नहींपर तुम्हारी काया से अधिक तुम्हारी आत्मा को चाहूंगा..! मैं प्रेमी हूँ… कान्हा नहींपर तुम्हारे नाम को सदैव अपने आगे लगाऊंगा..! मैं मर्यादित हूं… श्रीराम नहींपर तुम्हारे अलावा मैं किसी और का न हो पाऊंगा..!

बेवजह खुश रहो... वजह महंगी है.....!!

जहां पत्तियां नहीं झरती वहाँ बसंत नहीं आता

होठों पर जरूरत से ज्यादा बिखरी हंसी,अक्सर गवाह होती है आंखों में पसरी हुई उदासी की....

इतना दानी नहीं समय जोहर गमले में फूल खिला दे,इतनी भावुक नहीं ज़िन्दगीहर ख़त का उत्तर भिजवा दे, ~ गोपालदास नीरज


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