बात सच्ची जो करते हैं,
खुल के जीना उनका दुस्वार है भाई।
लकड़ी के कीड़े
पूरी कुर्सी खा जाते हैं...
और
कुर्सी के कीड़े
पूरा देश....!!
जो भी जितना साथ दे वो एहसान है, लंबा साथ तो सिर्फ़ ख़ुदा का होता है। लोग इतना ही निभा सकते हैं जितना उसका ज़र्फ़ था सो उतना निभा दिया उसने…
क्यों डरें ज़िन्दगी में क्या होगाकुछ ना होगा तो तजरूबा होगा
दीप मंदिर के हों या दरगाह के,
हम फक़त रौशनी ही चाहते हैं.
मुक्कमल करनी हो जिंदगी तो कोलाहल ना करेराहों में लगी ठोकरों का यूं मलाल ना करेअगर खुद पर यकीन है तो उसे पूरा कर कुछ कमाल करेयूं छोटी मोटी बातों पे ऊपर वाले से बेतुके सवाल ना करें
स्त्री का सम्मान ही पुरुष की मर्दानगी हैं,और पुरुष के सम्मान में ही स्त्री की सुंदरता हैं…
चार चार बेटियां विदा हो जाती है खेल कूद कर,
और बहुएं आते ही नाप देती है, कि घर बहुत छोटा है।
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कहने का ढंग जरूरी है....ढंग से कहने के लिए....
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जिसमे निखरे वो भी इश्क़ था , जिसमे बिखरे वो भी इश्क़ है ...
नींद भी क्या खूब होती है यदि आ जाये तो सब कुछ भुला देती है और ना आए तो हर कुछ याद दिला देती है !!!
ऐसे माहौल में दवा क्या है दुआ क्या है ,
जहाँ कातिल ही खुद पूछे कि हुआ क्या है ..!!
तू ज़ाहिर है लफ़्ज़ों में मेरे
मैं गुमनाम हूँ खामोशियों में तेरी…
अपनी बेटी को ज्ञान देकर अच्छे और बुरे का,
उसे इस गंदे समाज का आईना दिखाता है,
एक पिता ही है जो मजबूती से हांथ पकड़कर,
उसे कदम से कदम मिलाकर चलना सिखाता है..
बदला नहीं लूँगा, बस बदल जाऊँगा.
किसिको गिराऊँगा नहीं, बस संभल जाऊँगा !
सब लोग कहते हैं ..... " सीता और द्रौपदी के कारण हुई रामायण और महाभारत, किसी ने यह नहीं कहा नारी का सम्मान न करने अंत है रामायण और महाभारत " !!
काश ये सिर्फ शायरी ना होकर हकीकत हो जाती,
जी भरकर देख लेता तुझे अश्कों की बरसात हो जाती..!!
विरक्ति
अक्सर इत्तेफाक से मिलने वाले,मर्ज़ी से बिछड़ जाते हैं !
इंसां तिरे वुजूद का मक़सद ही इश्क़ था, तू नफ़रतों की राह में कैसे भटक गया ?
अजीब हैं मेरा अकेलापन. न तो खुश हूँ,न ही उदास हूँ, बस खाली हूँ और खामोश हूँ..