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बिसाते-जिंदगी पर हसरतों के प्यादे हैं, मुकम्मल लोग भी कितने अधूरे-आधे हैं...

हर रिश्ता इसी कागज़ का गुलाम हैं..जिसे हम पैसा कहते हैं..

ना दशहरा ना होली ना दिवाली होता हैं, बेरोज़गारो का त्योहार नौकरी होता हैं...

हर समस्या का समाधान होता है…तो अब इस समस्या का समाधान क्या है ?

जिंदा इंसान को गिराने मे औरमरे हुए इंसान को उठाने मे,ग़ज़ब की एकता दिखाते हैं लोग…

बुद्धि अगर स्वार्थ से मुक्त हो, तो हमे उसकी प्रभुता मानने में कोई आपत्ति नहीं।

मेरा रूठना तेरा मनाना मुझे मेरा कहना तेरा सुनना मुझे मेरा समझाना तेरा समझना मुझे मेरा बेपरवाह होना और तेरा जिम्मेदार कहना मुझे हाए...वो भी क्या खुश़-फैमियां थी मेरी ।।

रिश्ता कैसा यह जानने से अच्छा है, अपनापन कितना है ये महसूस किया जाए....

भिन्न मत का मान रखो, गलत का नहीं

हर एक हर्फ का अन्दाज बदल रक्खा हैआज से हमने तेरा नाम ग़ज़ल रक्खा हैमैंने शाहों की मोहब्बत का भरम तोड़ दियामेरे कमरे में भी एक ताजमहल रक्खा है।

नसीब में कुछ रिश्ते अधूरे ही लिखे होते हैं.. लेकिन उनकी यादें बहुत खूबसूरत होती हैं..!!

कहने को सभी अपने है लेकिन सिर्फ़ कहने को …..!!!

हम भूल सके हैं, न तुझे भूल सकेंगे,तू याद रहेगा हमें, हाँ याद रहेगा.

मेरे दोस्तों साथ नहीं रहने से रिश्ते नहीं टूटा करते,लोग कहते हैं मेरा सपना टूट गया, टूटी नींद है सपने नहीं टुटा करते

समाज की नज़र में दारू पीने वालेअमीर आदमी हैं तो ड्रिंक करता हैमिडिल क्लास हैं तो शराब पीता हैगरीब आदमी है तो वो बेवड़ा है

जो जितना तुम्हारा है तुम भी उसके उतने ही रहो ज्यादा दिल की गुलामी में इज्जत की नीलामी हो जाती है

“मनुष्य दूसरों की दृष्टि में कभी पूर्ण नहीं हो सकता, पर उसे अपनी आँखों से तो नहीं ही गिरना चाहिए.! ” जयशंकर प्रसाद

जंगलों में आज भी मुझे लगता नहीं है डर है शुक्र कि अब तक जानवर इंसां नहीं बने अम्बष्ठ

इश्क़ ने सीख ही ली वक़्त की तक़सीम के अब वो मुझे याद तो आता है मगर काम के बाद

अगर पुरखों ने खेत में हल चलाकर "कलम" पकड़ने के लायक बनाया हैं, तो कलम का फर्ज हैं कि अब वह "हल" का कर्ज उतारे।


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