भूमि और भाग्य का
एक ही स्वभाव है..!
जो भी बोया है..
वो निकलना तय है..!!
तेरे ख़्वाबों से
अच्छे मेरे ख़्यालात है,,,
तुम ख़्वाबों मे भी दगा करते हो
कितना भी चाहूँ
तुम मेरे नहीं होते,,,,
पर ख्यालतो मे तुझे
मुक्कुमल पा लेता हूं
प्रेम करुणा बन के आंखो से न बहे तो..
समझो अंतर मन में उतरा ही नहीं...!!
आप दीवार के चित्रों को बदल कर
इतिहास के तथ्यों को नहीं बदल सकते है।
जवाहरलाल नेहरू
मरना तो है ही,
अपने मनुष्यत्व और अधिकार के लिए मरो !
“छत टपकती हैं उसके कच्चे मकान की….फिर भी बारिश हो जाये तमन्ना हैं किसान की”
जिस दिन हम अपनी हद पार करेंगे,
तुम्हे तेरी सल्तनत से भी उठा लाएंगे !!
कभी कभी बहुत ग़ुस्सा आता हैं ख़ुद पर ,मैं जैसे हूँ वैसे क्यों हूँ ?
बूढ़े मां बाप को अपने घर से निकाल रखा है
अजीब शौक है बेटे का, कुत्तों को पाल रखा है
जीवन का परिचय बहुत सीधा सा है….आसूं वास्तविक है और मुस्कान में अभिनय है..!!
उनकी भी क्या इज्ज़त करना,
जिनकी हरकते कुत्तों जैसी हो।....
ख़ुद के साथ समयबिताने में मज़ा आने लगेतो समझ जानापरिपक्व होने लगे हो
इतिहास गवाह है की कोई भी वास्तविक परिवर्तन
चर्चाओं से कभी नहीं हुआ।
सुनो लड़कियों घर से भागो
प्रेमी के साथ नहीं।
इतिहास
भूगोल
विज्ञान
साहित्य की किताबें लेकर,
जब इन किताबों को सीढ़िया बनाकर
मारियाना की गर्त से लेकर,
चांद पर पहुंच जाओगी।
तब कोई भी प्रेमी भगाएगा नहीं
बल्कि
ख़ुद ही चोरी छिपे किताबें देगा
बजाय फूल और झूठी प्रसन्नता के।
पहले मुग़ल दरबार में नाचते थे,अब मस्जिद के बाहर नाचते हैं,जगह और समय बदला है,मानसिकता व हरकत अभी भी वही है!
माँ
एक बोझा लकड़ी के लिए
क्यों दिन भर जंगल छानती,
पहाड़ लाँघती,
देर शाम घर लौटती हो?
माँ कहती है :
जंगल छानती,
पहाड़ लाँघती,
दिन भर भटकती हूँ
सिर्फ़ सूखी लकड़ियों के लिए।
कहीं काट न दूँ कोई...
धन दौलत को चाहने वाला बिखर जाता है,
और महादेव को चाहने वाला निखर जाता है !
थक गया हूं मेहमान की तरह घर जाते जाते,
बेघर हो गए हम चंद रुपए कमाते कमाते..!
✯||ज़रा ठहरो तो नज़र भरके देखे तुम्हे
जमीं पे चांद कहा बार बार आता है...||✯
समंदर
तारीफ करने वालों से ज़्यादा ,
तुम्हारी चिंता करने वालों की परवाह करो ...