क्या मनाउ होली..
कैसे मनाउ जश्न...
जब फिलिस्तीन के..
बच्चो के जिस्म पर है..
खुन निकलता जख्म
ख़ुश मिजाजी मशहूर हैं हमारी सादगी भी कमाल है
हम शरारती भी बेइंतेहा के है तन्हां भी बेमिसाल है
रिमझिम रिमझिम बारिश में भीगा भीगा ये मन, चुपके चुपके दबे पाँच आती तुम्हारी यादें और बहते बहके से हम...
जिनको मेरी कदर नही अब मुझे भी,उनकी फिकर नही !
पुस्तक और प्रकृति से बेहतर दोस्त,इस दुनिया में और कोई नहीं !
मायूस भी नहीं है वो और खुश भी नहीं है, क्या बात है जो दिल को मजधार में ले आई.. रफ़्ता रफ़्ता खत्म हुए हम जो तेरे इश्क़ में अफसोस है कि मौत क्यों इक बार में न आई.. तुझे...
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कहने का ढंग जरूरी है....ढंग से कहने के लिए....
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यही जगत की रीत है, यही जगत की नीत
मन के हारे हार है, मन के जीते जीत
हजारों की भीड़ में भी पहचान लेते हैं,पापा कुछ कहे बिना ही सब जान लेते हैं..!!
क़त्ल हुआ हमारा इस तरह किश्तों में..!!कभी ख़ंजर बदल गए कभी क़ातिल बदल गए.!!
लोग हालचाल तक पूछना छोड़ देते हैं जब पता चल जाता है कि आप पैसे की वज़ह से असहाय और लाचार हो गए हों...
मैं कैसे कह दूँ आज मेरे मन में व्यथा नहीं,
पर संघर्षों से घबरा जाना मेरे कुल की प्रथा नहीं..!
वैसे तो बहुत से लोग मुझे जानते नहीं
फिर भी बता दूँ मैं वही बर्बाद शख़्स हूँ
अश्विनी यादव
शीघ्रता में विवाह करने पर
हम फुरसत से पश्चाताप करते हैं।
विलियम कांग्रीव
बच्चों को जहां चूमती है वो
ठीक उसी जगह चूमती थी वो
गलती माफ़ हो सकती है,
गलतियां भी माफ़ हो सकती हैं
....पर धोखा कदापि नहीं।
"कर्मणये वाधिकारस्ते मां फलेषु कदाचन।"
सुनोतस्वीर मेंतुम्हें देखनातुम्हें याद करनातुम्हें महसूस करनाऔर हर पल यह सोचनाकि तुम होती तो ऐसा होताग़र जो तुम होती तो वैसा होताहाय! सब कुछ कितना प्यारा होताकितना, कितना, कितना ही सुन्दर होता…
कोई कितना ही बड़ा क्यों न हो,
अंधों की तरह उसके पीछे न चलो।
स्वामी विवेकानंद
फकीरों की सोहबत में बैठा कीजिए साहब!!
बादशाही का अंदाज खुद ब खुद आ जाएगा...