हो सके तो समझाना मुझे,
वर्ना गलत समझ कर भूल जाना..
संघर्षों की समर भूमि में, हमसे पूछो हम कैसे हैं,
कालचक्र के चक्रव्यूह में, हम भी अभिमन्यु जैसे हैं।
हरिओम पंवार
बूढ़ा बाप समझा मुकद्दर संवर गया ,
बेटे ने डिग्री ली और घर से निकल गया ।।
वो ख़्वाब रात काचाय साँझ कीबारिश की बूंदें रूमानीवही समां पुरानाधड़कनों से बतियानाबदला नहीं है कुछ भीवही मिज़ाज़ आशिकानाचलो निभाते हैं हम तुमवही पुराना याराना लेकर चुस्कियाँ चाय कीकरेंगे गुफ्तगू शायराना
मिलकर सबसे रहो,
दबकर किसी से नही।।
खुद को कम बताकर तो देखोसामने वाले को अपनी औकात बताने में देर लग जाए तो कहना…..
नोट- यहाँ "औकात" से तात्पर्य केवल धन से तो बिल्कुल भी नही है॥
कुछ किताबे ताउम्र धूल फाँकती रह जाएगी,
एक रुपया ही सही किसी का तुम पर उधर रह जाएगा,
कुछ कपड़े बिन पहने ही अलमारी मे दबे रह जाएँगे,
किसी अपने से मुलाकात अधूरी रह जाएगी,
किसी खास से दिल की बात कभी कह नहीं...
माना के मां की गोद बहुत लाजवाब है एहसान पिता का भी कोई कम तो नहीं है...
मैं तुम्हारे मिज़ाज के मुताबिक नहीं हूँ,
हाँ कड़वा ज़रूर हूँ मगर मुनाफिक नहीं हूँ..
रेल की तरह गुजर तो कोई भी सकता है...
इंतजार में पटरी की तरह पड़े रहना ही असली इश्क है..!!
जमीन पर कही तो कोई ऐसी जगह होगी जहा हम मिलेगे.
यूॅं बार-बार मुझसे पूछकर मेरा इश्क़-ए-बयां ,
तुम "सज़दों" को शब्दों में तौला न करो..!!
आदत रही है हमारी दिल पर अकेले राज करने की, हम उनके नहीं होते जिनके दिल में हजारों कि भीड़ हो..!!
शहर जाकर बस गया हर शख्स पैसे के लिए ,
ख्वाहिशों ने मेरा पूरा गाँव खाली कर दिया ..!!
हालातों ने खो दी इस चेहरे से मुस्कान..वरना जहाँ बैठते थे रौनक ला दिया करते थे…
ख कर लगे है तुझको ये राब्ता पुराना है
तेरी ही बाहों में जैसे गुज़रा इक ज़माना है