तूने जो ना कहा मैं वो सुनती रही ख़ामख़ाह, बेवजह ख़्वाब बुनती रही जाने किसकी हमें लग गई है नज़र इस शहर में ना अपना ठिकाना रहा दूर चाहत से मैं अपनी चलती रही ख़ामख़ाह, बेवजह ख़्वाब बुनती रही ....
तरस आता है अपने बाप पर, उसे औलाद मुझ जैसी मिली.
बच्चों की सी फितरत है मेरी हसरतों की... ज़िद करना , मचल जाना , फिर..... खुद ही संभल जाना..!!
फिर हमनें अपनी आंखो को सजाया है तुम्हारे लिएतुम अपना दिल कब सजाओगे मेरे लिए....!!
मुनाफिक और बत्तमिज में अगर फ़र्क किया जाए तो बत्तमिज ज्यादा खतरनाक नही होता जितना मुनाफिक होता है