कभी खुदा से मिला तो जरूर पूछूंगा,ग़ुलाब' कितने लगे थे तुम्हें बनाने में...

और ,फिर मेरा खुद को संभाल के संभल जाना ही इस आधी अधूरी प्रेम कहानी का अंत होगा।

"उम्मीद" ही होती है शायद गम की वजह….वरना ख्वाहिशें रखना कोई "अपराध" तो नहीं..!

बुलंदियों का नशा हमने देख रखा है….बड़ा मुुश्किल है आसमां पे ज़मीर साथ रखना..!

छुप छुप कर क्यूँ पढ़ते हो अलफाजों को मेरे,सीधे दिल ही पढ़ लो सांसों तक तुम ही हो..!!

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