जब-जब धर्म की ग्लानि-हानि यानी उसका क्षय होता है और अधर्म मे वृद्धि होती है, तब-तब मैं धर्म के अभ्युत्थान के लिए अवतार लेता हूं !!

ये चार दिन की जिन्दगी, किस किस से कतरा के चलूं, खाक हूँ मैं…खाक पर…क्या खाक इतरा के चलूं...

मसरूफ हो बोहोत तुम ... कहो खुश तो हो ना तुम ...

न मैं गिरा और न मेरे हौसलों के मीनार गिरे। पर, लोग मुझे गिराने में कई बार गिरे...

अहंकार करने पर इंसान की प्रतिष्ठा, वंश वैभव तीनों ही समाप्त हो जाते हैं।

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