दिल पर तो बहुत ज़ख़्म ज़माने के लगे हैंख़ुद-दारी से लेकिन कभी रोया नहीं जाता पहरे मिरे होंटों पे लगा रक्खे हैं उस नेचाहूँ मैं गिला करना तो बोला नहीं जाता ~ अज़हर नय्यर

वही फिर मुझे याद आने लगे हैंजिन्हें भूलने में ज़माने लगे है

कब कौन समेटता है यहाँ,खुद तोड़ कर पूछते है महफूज तो हो तुम…

पत्थर दिल बनना मेरी मजबूरी है ,अगर में भीखर गया तो कोई मुझे समेट नहीं पाएगा…

मुझे तुम्हारा साथ चहिए,तुम्हारी सलाह नहीं…

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