जो मेरी ज़िंदगी की किताब का दस पन्ना भी न पढ़ा सका हो……. उसकी नज़रों में हम ख़ुदगर्ज़ नज़र आ रहे हैं……..
मरना है इक रोज सभी को ही बस ख्वाहिश इतनी है उस पल हाथों में हाथ बस तेरा होरहे तू सामने मेरे और मेरी आंखों को दीदार सिर्फ तेरा हो.... जा सकूं मैं इस दुनिया से चैन से इस तरह...
यकीनन जीत जाते तुमसे वफाओं की बात में, हम तो बस तुम्हारी रंजिशों से हारे थे... बेवजह ही तुमपर ऐतबार किया था ख़ता थी हमारी , के हम तेरे सहारे थे...!!
किसी को ख़ोकर उसकी कद्र की , तो क्या कद्र की...जिस्म से रूह निकल जाने पर वापस नहीं आती...!! "वैरागी"
गम से खाली नहीं जिस्म का कोना कोई हम रहे न रहे हम पे मत रोना कोई..!!