अब कोई मरहम काम नहीं करता उन ज़ख्मों पर, जो मुझे मेरी वफ़ा के बदले उससे इनाम में मिले थे..!!
मायूस भी नहीं है वो और खुश भी नहीं है, क्या बात है जो दिल को मजधार में ले आई.. रफ़्ता रफ़्ता खत्म हुए हम जो तेरे इश्क़ में अफसोस है कि मौत क्यों इक बार में न आई.. तुझे...
हम चाह के भी खण्डहर ना हो पाए, मेरी बुनियाद में, तेरे नाम के पत्थर जो लगे हैं...
मैं कितना भी गैर जरूरी हो जाऊं तुम्हारे लिए मेरे आंसुओ का बोझ कम ना होगा, और रह लो तुम कितना भी मेरे बिना खुश, मेरी सिसकियों का कर्ज़ तुम्हारे ज़िन्दगी से कम ना होगा...!!
वो करता है जब भी तारीफ़ मेरी... हाय,चेहरा मैं उसके सीने में छुपाती हूं..!!