कैसे सोऊँ सुकून की नींद …सुकून से सुलाने वाले की ही तो याद आ रही है.

सदा जो दिल से निकल रही हैवो शेर और नगमों में ढल रही हैकी दिल के आंगन में जैसे कोईग़ज़ल की झांझर छनक रही है

जिंदगी बसर करनी है तुम्हें सांपों की बस्ती में,फन कुचलने का हुनर सीख लेना वरना ड़से जाओगे.

“प्रतिभा तो ग़रीबी ही में चमकती है दीपक की भाँति, जो अँधेरे ही में अपना प्रकाश दिखाता है।” ~ मुंशी प्रेमचंद

बारिश में भीग मन बावलाधीरे-धीरे पट हृदय के खोल रहाआंखों से चूम तन बावलामृग कस्तुरी बन स्वच्छंद दौड़ रहा

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