मेरे शौक तो छोड़ो मेरी ज़िद भी छोड़ो मन को इतने टुकड़ों में बांटा है उसने अब तो ज़रूरत भी मुझे ज़रूरी नहीं लगती..!!

जब लहजे बदल जाएं तो वज़ाहतें कैसी..नए मयस्सर हो जाएं तो पुरानी चाहतें कैसी..!!

छतरियाँ हटा के…मिला करो इनसे, ये जो बूँदें हैं ना,बहुत दूर से आती हैं।

छिन जाती है "मासूमियत" चेहरे की,मुफलिसी "उम्र" देखकर वार नहीं करती..!!

कुछ मन्नतें पूरी होने तकवफादार रहना ऐ जिंदगीबहुत अर्जियां डाल रखी हैमैंने उम्मीदों के दामन में

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