कुछ तो अच्छा लिखा होगा मेरे भी हिस्से में ख़ुदा सिर्फ जिंदा रहना "जिंदगी थोड़ी है

ग़लतियाँ उसकी क्या गिनाऊँ मैं इक कसर छोड़ी नइँ सताने में

मुफ्त में मिलती साँसें नहीं , मौत का भी यार दाम चुकाना पड़ता हैं ..

हमारे क़द के बराबर न आ सके जो लोग. हमारे पाँव के नीचे खुदाई करने लगे...!!

ज़िंदगी इक़ बुरी बला है तो इन बलाओं से जूझते है मौत इक़ हल नही चलो ख़ुद की ख़ता'ओ से जूझते है

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