पवित्र महीना सावन का है, भोले तू मुझको भी पवित्र कर दे, महका सकूं अपने कर्मों से, सबको तू मुझको ऐसा इत्र कर दे..!!

चले जाना चाहता हूँ बहुत दूर... जहाँ कोई भी न हो! चले जाना चाहता हूँ उन बर्फीली पहाड़ियों के अनज़ान सफ़र पर जिसका कोई अंत न हो! मैं ख़ुद को भी भूल जाना चाहता हूँ! परिन्दों की तरह सब कुछ छोड़ आसमां में उड़ना चाहता हूँ!

आंखें थक गई थी "इंतज़ार" में फिर भी दस्तक लगाए बैठा रहा, हलक सूख गया रोते रोते मगर वो अपनी अकड़ में ऐंठा रहा..!! विरक्ति

आदत अकेलेपन की जो पहले अज़ाब थी , अब लुत्फ बन गई है अज़ीयत नहीं रही ।।

एक उदास शहर में कुछ किताबें थी एक छत चार दीवारें थीं कुछ दोस्त थे चाय के कुल्हड़ थे गलियाँ थी किनारे थे एक उदास शहर में जहाँ वो थी और ज़िंदगी थी..

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