तेरा चुप रहना मिरे ज़ेहन में क्या बैठ गयाइतनी आवाज़ें तुझे दीं कि गला बैठ गयायूँ नहीं है कि फ़क़त मैं ही उसे चाहता हूँजो भी उस पेड़ की छाँव में गया बैठ गयाइतना मीठा था वो ग़ुस्से भरा लहजा...
मैंने अपनी पीड़ा किसी को नहीं बताई,क्योंकि मेरा मानना है कि व्यक्ति मेंइतनी ताकत हमेशा होनी चाहिए कि अपने दुख,अपने संघर्षों से अकेले जूझ सके
और आखरी में, वादों का महल ढह गया,दिल के हिस्से में सिर्फ़ तड़पना रह गया !!
ना मंदिर कि बात होगी ना शिवालय की बात होगी,प्रजा बेरोज़गार है निवालों की बात होगी
तुम्हारी नूर के दीदार को ,कहाँ रोक पायेगा हिजाब।दिल मेरा कहता है,क्यों ना दे दूँ तुम्हें,जन्नत की हूर का ख़िताब।।