आप दीवार के चित्रों को बदल कर इतिहास के तथ्यों को नहीं बदल सकते है। जवाहरलाल नेहरू

दूसरे से मिली इज्जत और अपनों से मिली बेइज्जती इंसान कभी नहीं भूलता है..

वो अफ़्साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन उसे इक ख़ूब-सूरत मोड़ दे कर छोड़ना अच्छा...

अब मुझे दूसरे का क्या, ख़ुद का आंसू पोंछना नहीं आता, हमने देख लिया हैं रूठ कर, यहां कोई मनाने नहीं आता!

ना धन चाहिए तुझसे ना दौलत चाहिए, मेरी मां मुझको बस मन कि शुद्धि चाहिए, और बिन मांगे बहुत कुछ मिल चुका है तुझसे, बस नियत संभाल सकूं, इतनी बुद्धि चाहिए..!!

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