लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने मेंतुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में

क्रोध से शुरू होने वाली हर बात,लज्जा पर समाप्त होती है

दिल का मामला है तो,दर्द से बनाकर रखिएगा हुज़ूर!किसी-न-किसी मोड़ पर,ठोकर ये खाएगा ज़रूर !

मुझे ये रूह से मिलने का ढोंग नईं करनामेरे बदन को तेरे स्पर्श की ज़रूरत है

तुम से नाराज़गी नहीं कोई ,हम ख़फ़ा हो गये हैं अब खुद से ।

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