उड़ने दो परिंदों को अभी शोख़ हवा में फिर लौट के बचपन के ज़माने नहीं आते बशीर बद्र

पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुवा, पंडित भया न कोइ। ढाई आखर प्रेम का, पढ़ै सो पंडित होइ॥ कबीर दास

रूठ जाने कि सदी गुज़र गई.. अब नज़र अंदाज़ करने का ज़माना है..!!

अज्ञानता हमेशा बदलाव से डरती है ! पंडीत नेहरु 🌹 🙏🏻

ये नफ़रत नहीं फितरत है मेरी , जिसे छोड़ दिया मतलब छोड़ दिया...

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