पैसे से सब कुछ खरीदा जा सकता है ,
मगर प्यार और संस्कार नहीं ...
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बेवफाओं का घर नही बसता
उनकी सिर्फ महफिलें सजती हैं
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सूखे मौसम में बड़ा चटक था तेरा फरेबी रंग 
अब बारिश क्या हुई, बदरंग हो गए।
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गांव मे गुलाम नही मालिक रहते है !
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उड़ने का शौक अगर जुनून बन जाए,
मजबूरी भी मजबूर होके घुटने टिका देती है
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वो हमारे परिवार का दुःख कैसे समझेगा 
जिसका अपना कोई परिवार ही नहीं है !
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व्यक्ति में इतनी ताक़त हमेशा होनी चाहिए
की अपने दुःख अपने संघर्षो से अकेला जूझ सके
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भला उनका भी बहुत कर रखा है,
जिंनकी नजरों में आज हम गलत है।
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घर के बड़े बेटे पर जिम्मेदारी डाली नही जाती है,
वो जिम्मेदारी को महसूस करता हैं,
क्योंकि वो बाप के समान होता है।
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आज की सुबह खास है 
बादल का वो टुकड़ा बारिश के साथ
तेरी यादों की फुहार भी लाया है
मैं खुद को आज सींचूँगी
मन में बसी विरह की तपिश
को इन गिली बूंदो से

कुछ नयी कलियाँ
कुछ नये सपने
कुछ नये से तुम
खिल के मेरे सीने में
फिर से बहार ले आओगे
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